अगर रेलवे टिकट का पूरा किराया वसूलती है, तो फिर आम यात्रियों को एक ही डिब्बे में भेड़-बकरियों की तरह क्यों ठूंसा जाता है?
सुविधा, साफ़-सफाई और बैठने की जगह मिलना कोई एहसान नहीं — यह हमारा अधिकार है।
जब पैसा पूरा लिया जाता है, तो सेवा भी पूरी मिलनी चाहिए।
कितने लोग इस बात से सहमत हैं? ✋
मुख्य संपादक : दत्ता सुरवसे






