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प्रेम मेरा धर्म II

शुभागी शिंदे बार्शी, महाराष्ट्र

 

प्रेम एक ऐसी सकारात्मक उच्च ऊर्जा है जो हमें एक-दूसरे से, प्रकृति से और ईश्वर से जोड़े रखती है। प्रेम मनुष्य का मूल स्वभाव है। प्रेम को समझने के लिए हमें स्वयं को जानना होगा। हमारे में तीन चीजें हैं, 1 पांच तत्वों से बना हड्डी-मांस का शरीर, 2 इसके अंदर सूक्ष्म ऊर्जा का प्रकाश 3 भृकुटि के बीच में चमकता सितारा आत्मा। शरीर,

 

मैं आत्मा, एक ऊर्जा हूँ, इस शरीर को धारण करती हूँ। शरीर बदलता है जन्म बाई जन्म लेकिन आत्मा अविनाशी है। ज्ञान, शक्ति, शांति, पवित्रता, सुख, आनंद के साथ प्रेम भी आत्मा का एक गुण है। इस सृष्टिचक्र में, वक्त के गुजरते, हम स्वयं को आत्मा भूल, शरीर समझने लगते हैं, तब हम पांच विकारों से प्रभावित होते हैं, वो हैं- अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह।

 

प्रेम को अहंकार, काम और मोह से मिक्स करने से सारी भ्रांति पैदा हो गई। प्रेम स्वतंत्र है, वो दूसरे को भी स्वतंत्रता देता है। अपेक्षा करने के बजाए न्यायपूर्ण व्यवहार करना सिखाता है। प्रेम का आधार सत्यता है। प्रेम स्वरूप व्यक्ति कभी भी कोई भेद नहीं करता, हरेक के लिए सम्मान, हरेक के लिए शुभभाव, कल्याण की भावना रखता है। स्वयं को और दूसरों को ऊपर उठाने में मदद करता है। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी सभी रिश्तों में प्रेम के मायने एक-समान होते हैं। कोई कैसा भी हो, प्रेम सबको सहयोग, हिम्मत देता है। प्रेम नॉन जजमेंटल रहना सिखाता है। वो सबको विश्वास, सुरक्षा, सुख देता है, ईमानदार रहना, अपनी कई बातों का त्याग कर सामने वाले की भावनाओं को महत्त्व देना सिखाता है।

हमारा और ईश्वर का नाता भी प्रेम से ही बनता है इसलिए तो हम उसे हमेशा याद करते हैं, पुकराते हैं, उससे मिलने के लिए जप-तप के बिल्कुल विरुद्ध विकार है अहका करते हैं। प्रेम के और मेरा, मैं ही सबकुछ हूँ, महान हूँ, सामने वाला कुछ भी नहीं, मुझे किसी की जरूरत नहीं आदि। मोह कहेगा, ये मेरा बच्चा है, इसे ऐसे रहना चाहिए, ये मेर पति हैं, इनको इतना सब करना चाहिए, देना चाहिए, मेरी हर बात माननी चाहिए आदि। ये बातेच्य निर्माण करती हैं जिससे ऑटोमैटिक रिश्तों में दूरी बन जाती है। आत्मा को स्वतंत्रता प्रिय है, बंधन नहीं। मोह में स्वार्थ होता है, मोह हमें सामने वाले पर आधारित कर देता है, चाहे भावनात्मक स्तर पर ही क्यों न हो।

 

काम विकार तो महाशत्रु है, जिसे आजकल प्रेम का नाम दे दिया गया है। काम पूरे शरीर को प्रभावित करता है। सामने वाले के प्रति अशुध्द भाव रखता है, जिससे अहित होकर दुख मिलता है। काम को आत्मघात करने वाली कटारी कहा गया है क्योंकि आत्मा और शरीर की सबसे ज्यादा ऊर्जा नष्ट करने वाला यही विकार है।

 

सबसे बड़ी हिंसा (क्राईम) काम विकार से संबंधित होती है। इससे भावनात्मक स्तर पर जो दुख मिलता है, उसकी जड़ें बहुत गहरी हो जाती हैं।

 

रिश्तों में धोखा, रिजेक्शन, ईर्ष्या, दुर्भावना, ये सब काम से संबंधित होती हैं, इससे जो कर्म बनते हैं, उनके परिणाम कष्टदायी होते हैं। रिजेक्शन, धोखा आदि से व्यक्ति अंदर से इतना टूट जाता है जो डिप्रेशन जैसी बीमारियों का शिकार बनता है या फिर स्वयं के जीवन को खत्म करने का विचार करता है। असुरक्षा का भाव कभी भी खुश नहीं रहने देता, खुशी तो जैसे खुराक है, अगर वो ही ना मिली तो जीवन नीरस है

 

Writer :BK Dr. Shubhangi Shinde

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